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2025 के अंत तक भारत जापान को पीछे छोड़कर विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया था | पर अब 2026 की शुरुआत में ही जीडीपी रैंकिंग में भारत को बड़ा नुकसान हो गया है जिससे भारत विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था से फिसल कर छठवीं बड़ी अर्थव्यवस्था पर नीचे आ गया हैl

जी.डी.पी. (G.D.P.) क्या है ?

जीडीपी का पूरा नाम सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product) है| इसका मतलब किसी भी देश में एक साल में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का योग या कुल मूल्य के बराबर होता हैl

उदाहरण के लिए : किसी भी कर के शोरूम में 1 साल में 5 लाख की 100 करें बेची गई तो उसका कर शोरूम की जीडीपी 5 लाख ×100 =5 करोड़ होगी l सरल शब्दों में कहे तो जीडीपी किसी देश की आर्थिक आकार या आर्थिक ताकत को दर्शाती हैl
किसी भी देश की जीडीपी की गणना चार चीजों के आधार पर होती है :
1.उपभोग : उसे देश के अंदर लोग कितना खर्च कर रहे हैं |
2.निवेश : उस देश मैं व्यवसाय पर कितना निवेश हो रहा है l 3.सरकारी खर्च : सरकार द्वारा वस्तुओं और सेवाओं पर कितना खर्च हो रहा है l
4.शुद्ध निर्यात : मतलब कुल निर्यात को कुल आयात से घटाकर जो बचता हैl

भारत की जीडीपी रैंकिंग में गिरावट क्या है इसके बड़े कारण :

भारत विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था से नीचे फिसल कर विश्व की छठी अर्थव्यवस्था बन गया है। लेकिन इसका कारण अर्थव्यवस्था का धीमा होना या सिकुड़ना नहीं है ।यह मुख्य रूप से रुपए के नीचे गिरने आधार वर्ष में संशोधन कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि निर्यात में मंदी के कारण हुई है । चलिए इन मामलों को विस्तार से जानते हैं ।

वैश्विक जीडीपी रैंकिंग (Global GDP Ranking) का मतलब है दुनिया के देशों को उनकी आर्थिक ताकत (GDP) या जीडीपी आकार (GDP Size) के हिसाब से क्रम में रखना होता है इसका लिस्ट अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष(IMF) या वर्ल्ड बैंक जारी करती है

रुपए का कमजोर होना :

भारतीय रुपए के कमजोर होने के पीछे बहुत से कारण हैंl जिनमें मुख्य रूप से भारत का व्यापार घाटा, देश में विदेशी निवेश का कम होना,डॉलर का मजबूत होना, अमेरिका में ब्याज दरों का बढ़ना ,कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरीऔर महंगाई जैसे कारण शामिल हैl

व्यापार घाटा :

भारत आयात होने वाली वस्तुओं जैसे पेट्रोलियम पदार्थ ,कच्चे तेल ,इलेक्ट्रॉनिक सामान आदि पर बहुत निर्भर है| जिसके कारण भौतिक वस्तुओं जैसे कच्चे तेल इलेक्ट्रॉनिक सामान एवं सोने जैसे बहुत से वस्तुओं का आयात हमारे द्वारा किए गए निर्यात से कहीं ज्यादा है| इसके कारण हमारे व्यापार का हिस्सा हमारे हमेशा घाटे में रहता है |साल 2024-25 में भारत का व्यापार घाटा 286.9 बिलियन डॉलर था| जो अब आने वाले वर्षों में 300 बिलीयन डॉलर से भी अधिक हो रहा है| इन वस्तुओं के आयात के लिए हमें अंतरराष्ट्रीय ई के रूप में अमेरिकी डॉलर खर्च करने पड़ते हैं जिसे अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है|

देश में विदेशी निवेश का काम होना:

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है | पर यह विदेशी निवेश को आकर्षित करने में सफल नहीं हो पा रही है| पहले भारत में विदेशी निवेश बहुत अधिक होता था उसे न केवल व्यापार घाटा कम होता है उसके साथ-साथ विदेशी मुद्रा भंडार भी बढ़ता है| पर हाल ही के वर्षों में भारत में आने वाली विदेशी निवेश कम हो गई है | और जो विदेशी निवेश भारत में आया था उसको भी विदेशी निवेशक बाहर निकल रहे हैं | जिससे रुपया और भी कमजोर हो रहा है|

डॉलर का मजबूत होना:

अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा (Global Currancy) है| जब भी दुनिया में युद्ध या मंदी जैसी वैश्विक अनिश्चितता आती है| जो कि अभी रूस-यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट में इजरायल-अमेरिका के साथ ईरान का युद्ध के कारण बनी हुई है |तब डॉलर की मांग दुनिया भर में बढ़ती है क्योंकि डॉलर विश्व में एक सुरक्षित संपत्ति मानी जाती है और वह मजबूत होता है | और डॉलर के मजबूत होने से बाकी निवेशक भी अपनी संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए दुनिया के किसी भी मुद्रा से ज्यादा डॉलर पर भरोसा करते हैं जिससे वे दूसरे देशों की मुद्राओं जैसे रुपए से निवेश वापस हटाकर डॉलर में निवेश करना ज्यादा सुरक्षित समझते हैं | यह स्थिति एक डाॉमिनो इफेक्ट (Domino effect) की तरह काम करती है | जिससे हमें प्रति डॉलर के लिए ज्यादा रुपए खर्च करने पड़ते हैं और रुपया कमजोर होता है|

विदेशों जैसे अमेरिका में ब्याज दरों का बढ़ना :

अमेरिका या कोई दूसरे देशों में उनके केंद्रीय बैंक या फेडरल रिजर्व के द्वारा ब्याज दरें बढ़ाई जाती है | तो निवेशक अपना पैसा भारत से निकाल कर वहां लगा देते है, ताकि उन्हें ज्यादा फायदा हो सके | जिससे भारत से पूंजी बाहर जाती है और रुपए कमजोर होता है|

कच्चे तेल की कीमतों का बढ़ना :

भारत अपनी जरूरत का 80% से भी अधिक क्रूड ऑयल विदेश जैसे सऊदी-अरब, यूएई ,इराक और रूस जैसे देशों से आयात करता है| अभी मिडल ईस्ट में युद्ध जैसी स्थितियों के कारण तेल की सप्लाई में तनाव बढ़ रहा है| जिससे कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही है | अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी होने से डॉलर की मांग बढ़ती है जिससे भारतीय रुपया कमजोर होता है|

महंगाई

भारत में महंगाई बढ़ने से रुपए की क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम हो जाती है | जिससे जिससे हमें उसी सामान जो कल तक सस्ते में मिल रहा था, महंगाई बढ़ने से उसे खरीदने के लिए ज्यादा रुपए खर्च करने पड़ते हैं| उदाहरण के लिए : कल तक जो टमाटर बाजार में ₹20 रुपए किलो में मिलता था| महंगाई बढ़ने के कारण उसका दाम ₹30 प्रति किलो हो गया है ,तो अब 1 किलो टमाटर खरीदने के लिए हमें अतिरिक्त ₹10 रुपए और खर्च करने पड़ेंगे|

क्रूड ऑयल की कीमतों में बढ़ोतरी :

भारत आयात पर निर्भर देश है| हम अपनी उर्जा जरूर खासकर कच्चे तेल के लिए भी 80% से ज्यादा आयात पर निर्भर हैं | भारत कच्चे तेल का आयात मुख्य रूप से रूस और मिडिल ईस्ट के देशों जैसे सऊदी अरब इराक और यूएई से करता है| वर्तमान में मिडिल ईस्ट में इजरायल अमेरिका दोनों ईरान के साथ युद्ध में उलझे हुए हैं | इस तनाव जैसी स्थिति के कारण मिडल ईस्ट से मिलने वाला कच्चा तेल बाधित हो रहा है| साथ ही में भारत के कच्चे तेल के प्रमुख आपूर्ति करता रूस के ऊपर भी भारी अमेरिकी प्रतिबंध है| जिसके कारण कच्चे तेल की सप्लाई दुनिया में कम हो रही है| इसलिए इसकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ गई है| कीमत बढ़ने से उद्योगों में ईंधन व कच्चे तेल से बने उत्पाद जैसे प्लास्टिक और रसायनों की कीमत बढ़ जाती है | और और ईंधन की कीमत बढ़ने से परिवहन भी महंगा हो जाता है जिसका सीधा असर सामान्य के मूल्य पर होता है| इसके कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में बहुत गहरा नकारात्मक असर पड़ता है|

भारत के निर्यात में मंदीं:

भारत के निर्यात में हाल ही के दिनों में काफी मंदीं देखी जा रही है इसके बहुत ही कारण है| उनमें से मुख्य रूप से अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर टैरिफ, विकसित देशों के बाजारों में मंदीं मिडल ईस्ट में तनाव और कच्चे माल की कमी के कारण हो रहा है|

अमेरिका द्वारा टैरिफ : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने का कारण देते हुए भारतीय सामानों पर 25% टैरिफ और 25% पेनल्टी कुल मिलाकर 50% तारीफ लगाया गया‌। जिसे भारतीय सामान अमेरिका के बाजार में महंगे हो गए| भारतीय सामान महंगे होने के कारण अमेरिका के बाजार में लोगों ने इसे खरीदना कम कर दिया | जिससे भारत द्वारा अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात में लगभग 20% से भी ज्यादा की कमी देखी गई|

विकसित देशों के बाजारों में मंदीं : विकसित देशों जैसे अमेरिका ,ब्रिटेन(UK) ,जर्मनी और जापान जैसे देशों में महंगाई और ब्याज दरों का बढ़ना और मांग में कमी के कारण मंदीं की स्थिति बनी हुई है। महंगाई के कारण लोगों के खर्च करने की क्षमता कम हो गई है ।और महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सेंट्रल बैंक को जैसे अमेरिका में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी किया गया है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी होने से लोन लेना महंगा हो जाता है जिससे लोग खर्च कम करते हैं और मांग भी कम होती है। इस कारण विकसित देशों के बाजारों में भारतीय सामान की निर्यात प्रभावित हो रही है।

मिडिल ईस्ट में तनाव: मिडिल ईस्ट में तनाव जैसे इजरायल-ईरान का युद्ध होती विद्रोही गुटों के हमले के कारण स्टेट आफ हॉरमोज और लाल सागर (Red Sea) जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग रूट बाधित हो गए हैं। समुद्री रास्ते बाधित होने से मिडल ईस्ट के साथ भारत का व्यापार लगभग 50% से भी ज्यादा नीचे आ गया है। इससे इससे इन देशों में होने वाला भारतीय निर्यात भी कम हो गया है|

आधार वर्ष में संशोधन:

क्या है आधार वर्ष ? आधार वर्ष (Base Year) जीडीपी की गणना के लिए उपयोग होने वाला बेंचमार्क होता है । इसका उपयोग वर्तमान जीडीपी और आर्थिक विकास की गणना करने के लिए होता है। आधार वर्ष के कीमतों का उपयोग करके वर्तमान के वर्ष की महंगाई को घटाकर देश की आर्थिक विकास की गणना की जाती है। उदाहरण के लिए यदि आधार वर्ष 2022-23 है तो अन्य वर्षो की जीडीपी की गणना 2022-23 के कीमतों के हिसाब से की जाएगी ।

भारत में जीडीपी की गणना के लिए फरवरी 2026 में आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया। इससे जीडीपी में लगभग 3% की गिरावट आई पहले के अनुमान वास्तविक से थोड़े अधिक थे। वैश्विक जीडीपी रैंकिंग की गणना डॉलर में होती है क्योंकि आधार वर्ष 2011-12 के मुकाबले 2022-23 में डॉलर महंगा हो गया इसलिए भारत की जीडीपी आकार डॉलर के हिसाब से थोड़ी छोटी हो गई। जिसका असर भारत की जीडीपी रैंकिंग पर पड़ा।

किन देशों ने छोड़ा भारत को पीछे:

2025 के अंत तक भारत जापान को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया था। पर 2026 के शुरुआत में भारत छठे पायदान पर नीचे आ गया जापान और ब्रिटेन जीडीपी रैंकिंग में भारत से आगे निकल गए। जहां जापान फिर से विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई वहां UK विश्व की पांचवी अर्थव्यवस्था में आ पहुंची ।

क्या है इसके कारण? कारण करण की अगर बात करें तो ब्रिटेन(UK)और जापान ने अचानक से तेजी से विकास हासिल नहीं किया। दरअसल जीडीपी रैंकिंग डॉलर में मापी जाती है और इन देशों की मुद्राओं की की स्थिति हाल ही के समय में डॉलर के मुकाबले मजबूत हुई है। इसलिए इन देशों की धीमी विकास के बावजूद भी जीडीपी रैंकिंग बढ़ी है। इससे यह महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि वैश्विक जीडीपी रैंकिंग आर्थिक विकास पर नहीं मुद्रा के उतार-चढ़ाव से भी काफी हद तक प्रभावित होती है ।

दुनिया के टॉप-10 देश जीडीपी रैंकिंग के आधार पर

जीडीपी रैंकिंग देश जीडीपी ट्रिलियन डॉलर में
1.संयुक्त राज्य अमेरिका32.38
2.चीन20.85
3.जर्मनी5.45
4.जापान4.38
5.ब्रिटेन4.26
6.भारत4.15
7.फ्रांस3.6
8.इटली2.74
9.रूस2.66
10.ब्राजील2.64

क्या वैश्विक मंदी के कारण बाद भारत की जीडीपी पर असर:

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और बहुत से अर्थशास्त्रियों के हाल के ही रिपोर्ट और बयानों से 2026 में वैश्विक मंदी के मौसम बनने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों की माने तो वैश्विक मंदी का भारत पर मिला-जुला असर पड़ सकता है। जहां विदेशी बाजारों में मंदी और कम होती मांग के कारण भारत के निर्यात में कमी आएगी। वहीं भारत तेजी से विकास करते हुए दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में बना रहेगा। संक्षेप में समझे तो वैश्विक मंदी के बावजूद 2026 में भारत के विकास में तेजी से बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।

क्या है वैश्विक मंदी? वैश्विक मंदी एक ऐसा समय है जिसमें दुनिया भर में हो रही आर्थिक गतिविधियां जैसे व्यापार उद्योग रोजगार और निवेश में भारी गिरावट आ जाती है। और दुनिया की आर्थिक वृद्धि बहुत तेजी से रुक जाती है इसे वैश्विक मंदी कहते हैं।

क्या भारत की आर्थिक रफ्तार हो गई है धीमी ? :

2026 की आंकड़ों को देखें तो भारत की आर्थिक रफ्तार अभी भी तेज है। हालांकि वैश्विक चुनौतियों और भू-राजनीतिक तनाव जैसे मिडिल ईस्ट में युद्ध (West Asia war) आदि के कारण विकास की रफ्तार में उतार चढ़ाव जरूर आया है।अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार भारत की विकास दर अभी भी 6.5% से ऊपर आ की गई है हालांकि वैश्विक तनाव और मंदी के कारण वित्त वर्ष 2026-27 के विकास दर में पहली छमाही में थोड़ी सुस्ती आ सकती है। पर बाद में यह फिर से रफ्तार पकड़ लेगी सरल शब्दों में जाने दो भारत अभी भी तेजी से विकास करती हुई विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्था बनी हुई है।

जीडीपी रैंकिंग में गिरावट से आम लोगों पर असर:

भारत वैश्विक जीडीपी रैंकिंग में चौथे स्थान से पिछड़कर छठवें स्थान पर आ गया है ।चलिए जानते हैं भारत के आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा।

महंगाई का बढ़ना: रुपए के के डॉलर के मुकाबले कमजोर होने से (जो की जीडीपी रैंकिंग में गिरावट के मुख्य कारणों में से एक है) भारत के लिए कच्चा तेल आयात करना महंगा हो जाता है। इसके साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य सामान भी महंगे हो जाते हैं। कच्चे तेल के महंगे होने से ईंधन और यातायात भी महंगा होता है। जिससे वस्तुओं का दाम भी बढ़ जाता है।

उपभोग कम हो जाना: जीडीपी रैंकिंग में गिरावट से लोगों पर यह मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है कि हमारा देश की हमारे देश की अर्थव्यवस्था धीमी हो रही है। और साथ ही महंगाई बढ़ने से लोगों की खर्च करने की शक्ति कम हो जाती है। और वह कम पैसा खर्च करने लग जाते हैं ।

भारत की छवि का अस्थाई नुकसान और नए रोजगार के अवसर कम होना : चौथी से छठवें जीडीपी रैंकिंग में आने से भारत की मजबूत आर्थिक छवि को अस्थाई नुकसान होगा जिससे विदेशी नया निवेश कम हो सकते हैं तथा नई नौकरियां एवं व्यवसाय के अवसर कम हो सकते हैं।

सरकार की प्रतिक्रिया :

जीडीपी रैंकिंग में गिरावट पर भारत सरकार की सकारात्मक प्रतिक्रिया आई है। इससे भारत में कोई भारत में कोई आर्थिक सुस्ती नहीं आई है। इस गिरावट को अस्थाई बताया गया है। भारत सरकार का कहना है कि देश अभी भी दुनिया में सबसे तेजी से विकास करती प्रमुख अर्थव्यवस्था बनी हुई है। यह रैंकिंग गिरावट सिर्फ आंकड़े हैं इससे देश के विकास में कोई कमी नहीं आई है।

विशेषज्ञों की राय :

विशेषज्ञों के अनुसार यह गिरावट भारत के विकास दर में सुस्ती के कारण नहीं है। जबकि अन्य बाहरी कारण से हुई है। जिनमें मुख्य रूप से रुपए की कमजोरी ,आधार वर्ष में बदलाव, भू राजनीतिक तनाव जैसे मिडल ईस्ट में युद्ध और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ,जापान ब्रिटेन की मुद्राओं का डॉलर के प्रति मजबूत प्रदर्शन के कारण है विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अभी भी दुनिया की सबसे तेज विकास करती अर्थव्यवस्था है और जीडीपी रैंकिंग में आई यह गिरावट स्थाई और कागजी(on paper) है। आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत 2027 तक फिर से दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।

निष्कर्ष :

सभी आंकड़ों वैश्विक संस्थानों जैसे आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय को देखें तो भारत अभी भी दुनिया की सबसे तेज बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है। जीडीपी रैंकिंग में आई गिरावट अस्थाई और कागजी है। इससे भारत के विकास में हो रही वृद्धि को कुछ खास नुकसान नहीं पहुंचा है। सरल शब्दों में यह जीडीपी रैंकिंग में आई गिरावट कुछ खास चिंता करने का विषय नहीं है। अभी भी भारत का विकास तेज रफ्तार से बरकरार है।

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