हाल ही के समय में भारतीय रुपए में भारी गिरावट देखी जा रही है। भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अभी तक की सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया है। रुपया फिसल कर प्रति डॉलर करीब 95 से ज्यादा गिर गया है।क्या रुपया के गिरने से भारत में महंगाई बढ़ सकती है? आईए जानते हैं।

भारतीय रुपया :

भारतीय रुपया भारत की आधिकारिक मुद्रा(Indian currency) है। जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर INR से जाना जाता है। भारत के अंदर लेनदेन या खरीद बेज के लिए भारतीय रुपए का ही उपयोग होता है। भारतीय रिजर्व बैंक (R.B.I.)आई इसको जारी करती है तथा इसका नियमन करती है।

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भारतीय रुपए का इतिहास :

भारत में मुद्रा का इतिहास बहुत शानदार है ।क्योंकि भारत मुद्रा व्यवस्था शुरू करने वाली सबसे पहले सभ्यताओं में से एक है। भारत में लेन-देन के लिए सबसे पहले कौड़ियों का उपयोग होता था। कौड़ियों से पहले लोग बार्टर व्यवस्था से लेनदेन करते थे । बार्टर व्यवस्था का मतलब एक वस्तु के बदले किसी दूसरी वस्तु का लेनदेन होता है । उदाहरण के लिए
कोई किसान 50 किलो गेहूँ देकर बदले में कपड़े ले लेता था।
मान लीजिए किसी को आलू की जरूरत है और उसकी के पास चावल है तो वह दूसरे व्यक्ति को ढूंढेगा जिसके पास आलू है और उसे चावल देकर उससे आलू खरीदेगा। पर कई बार यह प्रथा ठीक से काम नहीं कर पाती थी। क्योंकि हो सकता है जिसके पास आलू है उसे चावल की जरूरत ही ना हो तो? वह चावल रखकर आलू क्यों देगा? इसलिए कुछ बुनियादी चीजों को मुद्रा माना गया । वह चीजें जिन्हें सब लोग उपयोग करते थे जैसे नमक अनाज पालतू जानवर आदि ‌ यह व्यवस्था भी आगे चलकर नाकाम हो गई क्योंकि बुनियादी चीजों को ज्यादा दिन तक स्टोर करके नहीं रखा जा सकता था। नमक और बीज खराब हो जाते ,पालतू जानवर बूढ़े हो जाते या कोई बीमारी से मर जाते। पर इस व्यवस्था के नाकाम होने के बाद बुनियादी चीजों की जगह ली कौड़ियों ने, लोगों ने लगभग 1200 ईसा पूर्व में मुद्रा के रूप में कौड़ियों का उपयोग करना शुरू किया और यह लगभग 4000 सालों तक चलता रहा।

भारत में सिक्कों की शुरुआत: भारत में सिक्कों की शुरुआत छठवीं शताब्दी में हुई ,यानी महाजनपद काल के समय यह सिक्के विभिन्न जनपदों द्वारा ढालें एवं जारी किए जाते थे। उस समय इन सिक्कों पन, पुराण और कर्षापन कहां जाता था। इन सिक्कों को चांदी के टुकड़ों पर पांच करके बनाया जाता था। आगे चलकर यही सिक्के मुद्रा के रूप में लेन-देन का आधार बने । फिर विभिन्न राजवंशों और राज्यों ने अपने समय में अपने अलग-अलग सिक्के जारी किए।

आधुनिक रुपए की शुरुआत : सन 1540 में दिल्ली की राजगद्दी पर शेरशाह सूरी ने कब्जा जमाया। और शेरशाह सूरी ने ही 1540 से 1545 के बीच रुपए की शुरुआत करी। उस समय जब चांदी का सिक्का बनाया गया उसका वजन 11.5 ग्राम के आसपास था। तब से लेकर आज तक भारतीय मुद्रा के रूप में रुपए का प्रचलन चल रहा है।

भारत में नोटों की शुरुआत : भारत में नोटों की शुरुआत पहली बार ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने की थी। उसे समय महारानी विक्टोरिया की तस्वीर वाले 10, 20, 50 ,100 और 1000 के नोटों का चलन था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद छोटे नोटों की कमी को दूर करने के लिए एक रुपए दो रुपए और 8 आने के भी नोट जारी किए गए। साल 1935 में रिजर्व बैंक आफ इंडिया(R.B.I.) की स्थापना की गई। तब से लेकर अब तक भारत में रिजर्व बैंक के पास ही नोट छापने तथा इसका नियमन करने का अधिकार है। आजादी के बाद भारत में सबसे पहले ₹1 का नोट सन 1949 में छापा गया जिसे 12 अगस्त 1949 को जारी किया गया था। इसके ऊपर अशोक स्तंभ का चित्र था। फिर साल 1954 में बड़े नोटों की भी शुरुआत हुई। साल 1978 में भारत सरकार द्वारा पहली बार नोटबंदी की गई जिसमें काफी बड़े नोटों को बंद किया गया और नए नोट जारी किए गए।

क्यों कमजोर हो रहा है भारतीय रुपया :

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अगर अब तक की स्थिति देखे तो हां भारतीय रुपए कमजोर हो रहा है। भारतीय रुपए की कमजोरी के पीछे कई वजहें हैं। इनमें मुख्य रूप से भारत का व्यापार घाटा, देश में विदेशी निवेश में कमी, डॉलर की मजबूती, अमेरिका में ब्याज दरों का बढ़ना, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और महंगाई जैसे कारक शामिल हैं।

व्यापार घाटा : भारत पेट्रोलियम पदार्थ, कच्चे तेल और इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसी आयातित वस्तुओं पर काफी निर्भर है। इस कारण कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान और सोने जैसी कई वस्तुओं का आयात हमारे निर्यात की तुलना में कहीं अधिक है। इसकी वजह से हमारा व्यापारिक हिस्सा हमेशा घाटे में रहता है। साल 2024-25 में भारत का व्यापार घाटा 286.9 बिलियन डॉलर था, जो आने वाले वर्षों में 300 बिलियन डॉलर से भी ऊपर जा रहा है। इन वस्तुओं के आयात के लिए हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी डॉलर खर्च करना पड़ता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर पड़ता है।

देश में विदेशी निवेश का कम होना: भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन यह विदेशी निवेश को आकर्षित करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पा रही है। पहले भारत में विदेशी निवेश काफी अधिक होता था, जिससे न केवल व्यापार घाटा कम होता था बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार भी बढ़ता था। हालांकि, हाल के वर्षों में भारत में आने वाला विदेशी निवेश घट गया है और जो निवेश पहले से मौजूद था, उसे भी विदेशी निवेशक वापस निकाल रहे हैं, जिससे रुपया और भी कमजोर हो रहा है।

डॉलर का मजबूत होना: अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा (Global Currancy) है| जब भी दुनिया में युद्ध या मंदी जैसी वैश्विक अनिश्चितता आती है| जो कि अभी रूस-यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट में इजरायल-अमेरिका के साथ ईरान का युद्ध के कारण बनी हुई है |तब डॉलर की मांग दुनिया भर में बढ़ती है क्योंकि डॉलर विश्व में एक सुरक्षित संपत्ति मानी जाती है और वह मजबूत होता है | और डॉलर के मजबूत होने से बाकी निवेशक भी अपनी संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए दुनिया के किसी भी मुद्रा से ज्यादा डॉलर पर भरोसा करते हैं जिससे वे दूसरे देशों की मुद्राओं जैसे रुपए से निवेश वापस हटाकर डॉलर में निवेश करना ज्यादा सुरक्षित समझते हैं | यह स्थिति एक डाॉमिनो इफेक्ट (Domino effect) की तरह काम करती है | जिससे हमें प्रति डॉलर के लिए ज्यादा रुपए खर्च करने पड़ते हैं और रुपया कमजोर होता है|

विदेशों जैसे अमेरिका में ब्याज दरों का बढ़ना : अमेरिका या कोई दूसरे देशों में उनके केंद्रीय बैंक या फेडरल रिजर्व के द्वारा ब्याज दरें बढ़ाई जाती है | तो निवेशक अपना पैसा भारत से निकाल कर वहां लगा देते है, ताकि उन्हें ज्यादा फायदा हो सके | जिससे भारत से पूंजी बाहर जाती है और रुपए कमजोर होता है|

कच्चे तेल की कीमतों का बढ़ना : भारत अपनी जरूरत का 80% से भी अधिक क्रूड ऑयल विदेश जैसे सऊदी-अरब, यूएई ,इराक और रूस जैसे देशों से आयात करता है| अभी मिडल ईस्ट में युद्ध जैसी स्थितियों के कारण तेल की सप्लाई में तनाव बढ़ रहा है| जिससे कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही है | अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी होने से डॉलर की मांग बढ़ती है जिससे भारतीय रुपया कमजोर होता है|

महंगाई : भारत में महंगाई बढ़ने से रुपए की क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम हो जाती है | जिससे जिससे हमें उसी सामान जो कल तक सस्ते में मिल रहा था, महंगाई बढ़ने से उसे खरीदने के लिए ज्यादा रुपए खर्च करने पड़ते हैं| उदाहरण के लिए : कल तक जो टमाटर बाजार में ₹20 रुपए किलो में मिलता था| महंगाई बढ़ने के कारण उसका दाम ₹30 प्रति किलो हो गया है ,तो अब 1 किलो टमाटर खरीदने के लिए हमें अतिरिक्त ₹10 रुपए और खर्च करने पड़ेंगे|

रुपए के गिरने से भारत एवं यहां के आम लोगों पर असर

भारत पर असर :

आयात बिल और व्यापार घाटे में वृद्धि: भारत आयात पर निर्भर देश है। हमें कच्चा तेल इलेक्ट्रॉनिक्स सोना और फर्टिलाइजर आदि को विदेशों से खरीदने के लिए डॉलर खर्च करना पड़ता है। रुपए के डॉलर के मुकाबले कमजोर होने से हमें प्रति डॉलर के लिए और अधिक रुपए खर्च करने पड़ेंगे, जिससे हमारा आयत का खर्च और ज्यादा बढ़ेगा। और भारत के व्यापार घाटे में वृद्धि होगी।

विदेशी निवेशकों द्वारा भारत से पैसा निकालना : रुपए के लगातार गिरावट से विदेशी निवेशक भारतीय स्टॉक मार्केट एवं अन्य जगहों से अपना पैसा बाहर ले जा रहे हैं। अगर रुपया और तेजी से गिरा तो विदेशी निवेशक और बड़ी संख्या में भारत से अपना पैसा बाहर निकलेंगे देश मैं विदेशी पूंजी की कमी हो जाएगी और भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से गिरेगा। विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट से देश आर्थिक संकट की ओर जाने लगता है।

भारत के आम लोगों पर असर:

महंगाई की मार : भारत कच्चा तेल, गैस ,सोने फर्टिलाइजर और इलेक्ट्रॉनिक जैसे चीजों के लिए आयात पर पूरी तरह से निर्भर है। इन सबको खरीदने के लिए डॉलर खर्च करने पड़ते हैं चुकी डॉलर रुपए के मुकाबले महंगा होता जा रहा है। इसलिए इन सब चीजों का आयात अब पहले से और महंगा होता जाएगा। कच्चा तेल महंगा होने से पेट्रोल डीजल महंगा हो जाएगा। जिससे चीजों का ट्रांसपोर्ट महंगा हो जाएगा और ट्रांसपोर्ट के महंगे होने से चीजों की कीमत बढ़ेगी। इससे भारत के आम लोगों पर महंगाई की सिद्धि मार पड़ेगी।

ब्याज दरों में दबाव और लोन लेना महंगा: महंगाई के बढ़ने से भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दर्द बड़ा सकता है ।जिससे लोगों या संस्थाओं के लिए लोन लेना महंगा हो जाएगा।

इसके अलावा भारतीय रुपए के कमजोर होने से विदेश यात्रा महंगी हो जाएगी। जो लोग विदेश में घूमने इलाज करने या पढ़ाई करने जाते हैं उनका खर्च बढ़ जाएगा। विदेशों में पढ़ाई या इलाज के फीस और रहने खाने का भी खर्च पड़ जाएगा।

क्या रुपए के गिरने से हो सकता है भारत को फायदा:

विशेषज्ञों की माने तो कुछ मामलों में रुपए की गिरावट फायदेमंद हो स कती है। पर यह गिरावट धीरे-धीरे और नियंत्रित तरीके से होनी चाहिए । तेजी से या बहुत अधिक गिरावट महंगाई और आर्थिक स्थिरता को बढ़ा सकती है। कुल मिलाकर भारत के लिए बहुत ज्यादा कमजोर रुपए से स्थिर रूपया ज्यादा बेहतर है।

फायदे: रुपए के गिरने से भारतीय सामान विदेश में सस्ता हो जाता है। भारतीय सामान सस्ता होने से भारत के कृषि, फार्मा, टेक्सटाइल्स, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रानिक सामानों का निर्यात बढ़ता है और साथ ही भारत के आईटी सेक्टर का भी निर्यात बढ़ता है। विदेश से आने वाले पैसे जैसे विदेश में काम करने वाले लोग डॉलर भेजते हैं तो परिवार को अधिक रुपया मिलता है। और विदेशी पर्यटक बढ़ता है। क्योंकि भारत रुपए के गिरने से सस्ता पर्यटन विकल्प बनकर सामने आता है।

नुकसान: आयात पर निर्भरता के कारण पेट्रोल-डीजल और इलेक्ट्रॉनिक्स का महंगा हो जाना। ट्रांसपोर्ट महंगे होने के कारण आम लोगों पर महंगाई की सीधी मार पड़ती है।

विशेषज्ञों की राय: विशेषज्ञों का मानना है कि रुपए में थोड़ी गिरावट सामान्य है। पर अधिक और तेजी से गिरावट चिंता का विषय है अगर रुपए में सालाना 2 से 5% के भीतर गिरावट आए तो निर्यात में बढ़ोतरी हो सकती है।

रघुराम राजन (पूर्व रिजर्व बैंक गवर्नर) का मानना है कि रुपए का मूल्य बाजार की आर्थिक परिस्थितियों के हिसाब से तय होना चाहिए। बहुत मजबूत या बहुत कमजोर मुद्रा का होना लंबे समय में देश के लिए समस्याएं पैदा कर सकती है। आरबीआई का ध्यान भी इस समय रुपए में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव को रोकने में लगा है। रुपए में ज्यादा गिरावट, विदेशी मुद्रा बाहर जाने एवं लगातार व्यापार घाटे से देश में महंगाई एवं आर्थिक संकट जैसी समस्याएं आ सकती है।

निष्कर्ष: भारत आयात पर निर्भर देश है। मुख्य रूप से कच्चे तेल के लिए तो महंगाई बढ़ने की बहुत अधिक संभावना है। रुपए के तेज गिरावट से देश में महंगाई बढ़ सकती है। हालांकि थोड़ा गिरावट आम माना जाता है।

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